Sunday, January 9, 2011

देश नाभिकीय कचरे के प्रबंधन में समर्थ

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शुक्रवार को सुबह लैपटॉप का बटन दबाकर तारापुर स्थित पावर रिएक्टर रिप्रोसेसिंग संयंत्र की शुरुआत की। इसे एतिहासिक क्षण बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि अब इस्तेमाल किए गए ईंधन की रिप्रोसेसिंग यह भी सुनिश्चित करेगी कि हम नाभिकीय ईंधन चक्र के उप उत्पादों यानी अवशिष्ट (कचरा) पदार्थो का भी बेहतर प्रबंधन व इस्तेमाल करने में समर्थ हैं । देश में नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन का केंद्र माने जानेवाले तारापुर में सौ टन सालाना क्षमता वाला यह दूसरा विद्युत रिएक्टर ईधर पुनर्सस्करण संयंत्र स्थापित किया गया है। इसे देश की प्रगति में मील का पत्थर बताते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि यह एक ऐसा उदाहरण है, जो दर्शाता है कि भारतवासी जो एक बार ठान लें, कोई भी कार्य कर सकते हैं। पीएम के अनुसार हमारी वर्तमान एवं भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए यूरेनियम का पुनर्चक्रण एवं उचित उपयोग आवश्यक है।

एईसी 2020 तक निर्धारित लक्ष्य पूरा होने के प्रति आशंकित
परमाणु ऊर्जा आयोग (एईसी) वर्ष 2020 तक 20,000 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा उत्पादन के प्रति आशंकित दिख रहा है। आयोग ने यह लक्ष्य महाराष्ट्र के जैतापुर में लगने जा रहे दुनिया के सबसे बड़े (9,900 मेगावाट) परमाणु ऊर्जा संयंत्र को मिलाकर निर्धारित किया था। स्थानीय लोग इस संयंत्र का जबर्दस्त विरोध कर रहे हैं। शुक्रवार को तारापुर में दूसरे पावर रिएक्टर फ्यूल प्रोसेसिंग संयंत्र के उद्घाटन के बाद परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. श्रीकुमार बनर्जी ने कहा कि वर्ष 2020 के लिए निर्धारित 20 हजार मेगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है, लेकिन इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में लगने जा रहे जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र की पहली दो इकाइयों (प्रत्येक 1,650 मेगावाट) के वर्ष 2018 तक शुरू करने की योजना बनाई गई है, लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध के कारण अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। जैतापुर के मछुआरों को आशंका है कि संयंत्र के कारण समुद्र का पानी गरम होने से मछलियां कम हो जाएंगी।


Saturday, January 8, 2011

ऊर्जा संयंत्र वाले राज्य होंगे रोशन

अब उन राज्यों को ज्यादा फायदा होगा जहां केंद्र सरकार की ताप बिजली परियोजनाएं लग रही हैं। आगामी 12वीं व 13वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान देश के जिस राज्य में इस श्रेणी की परियोजनाएं लगेंगी उस राज्य को उस परियोजना की 50 फीसदी बिजली मिला करेगी। शेष में से 35 फीसदी बिजली अन्य राज्यों को और 15 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार के खाते में जाएगा। इस बारे में एक प्रस्ताव को गुरुवार को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। इस फैसले की वजह से गदरवारा, तालचेर, कुडगी, दरलिपल्ली, बरेठी, कटवा, धुवरन, खारगोन, कठुवा, बिलहौर सहित कई अन्य बिजली परियोजनाओं पर असर पड़ेगा। ये परियोजनाएं आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में लग रही हैं। जाहिर है कि आने वाले वर्षो में इन राज्यों को ज्यादा बिजली मिला करेगी। कैबिनेट ने यह भी फैसला किया कि मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में एनटीपीसी की बरेठी परियोजना से 35 फीसदी बिजली पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश को दी जाएगी, ताकि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में बिजली पहुंचाई जा सके। इस परियोजना की 15 फीसदी बिजली के लिए अभी कोई फैसला नहीं किया गया है। सरकार ने उम्मीद जताई है कि नए नियम की वजह से राज्य ज्यादा से ज्यादा केंद्रीय बिजली परियोजनाएं लगाना चाहेंगे ताकि उनका बड़ा हिस्सा उन्हें मिल सके। खास तौर पर जिन राज्यों में बिजली की सबसे ज्यादा कमी है वे नई केंद्रीय परियोजनाओं को हरसंभव मदद मुहैया कराएंगे। कैबिनेट ने आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में राष्ट्रीय जोखिम चक्रवात निपटान परियोजना (एनसीआरएमपी) लागू करने के लिए 1496.71 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को भी हरी झंडी दिखा दी है। इससे आंध्र प्रदेश के 5.6 लाख और उड़ीसा के 5.5 लाख नागरिकों को फायदा पहुंचेगा। इन क्षेत्रों को चक्रवात से बचाने के लिए कई स्तर पर कदम उठाए जाएंगे।

Friday, January 7, 2011

तीन हजार साल का परमाणु ईधन है चीन के पास!

चीन ने इस्तेमाल हो चुके परमाणु ईधन से यूरेनियम और प्लूटोनियम बनाने में सफलता हासिल करने का दावा किया है। उसका कहना है कि यह तकनीक उसके परमाणु ऊर्जा बिजलीघरों को तीन हजार साल तक ईधन की आपूर्ति करा सकती है। सरकारी समाचार एजेंसी चाइना सेंट्रल टेलीविजन के अनुसार, चीन को दशकों की मेहनत के बाद इसमें सफलता मिली है। अब चीन 60 नए परमाणु संयंत्र स्थापित करने की योजना में है। इसके अलावा वह 2020 तक कम से कम 7.5 करोड़ किलोवाट की परमाणु ऊर्जा उत्पादकता हासिल करना चाहता है। चीन में वर्तमान परमाणु ऊर्जा तकनीक के तहत केवल तीन से चार प्रतिशत परमाणु ईधन का ही इस्तेमाल हो पाता है। मगर प्रयोग किए जा चुके परमाणु ईधन से कई गुना अधिक ऊर्जा मिल सकती है। इसके अलावा इसको जलाने से भी कई परमाणु पदार्थो को प्राप्त किया जा सकता है। नई तकनीक के द्वारा परमाणु ईधन से 60 गुना अधिक ऊर्जा हासिल की जा सकती है। वर्तमान में मौजूद यूरेनियम पदार्थो से चीन के परमाणु बिजलीघर को सिर्फ 50 से 70 साल तक ही ईधन प्राप्त हो सकता है, वहीं नई तकनीक की बदौलत चीन तीन हजार साल तक का परमाणु ईधन बना सकता है। चीन के लिए इसे बहुत ही बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। चीन विश्व में ईधन की सबसे ज्यादा खपत करने वाला देश है और वह अपनी तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु बिजलीघरों के व्यापक विस्तार पर जोर दे रहा है। दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला चीन न सिर्फ कोयले की सबसे अधिक खपत करने वाला देश है बल्कि चोटी का पर्यावरण प्रदूषक भी है। चीन में इस समय 12 परमाणु बिजली घर काम कर रहे हैं और 23 निर्माणाधीन है। पूर्व में चीन परमाणु बिजलीघरों के निर्माण के लिए जापान, अमेरिकी और यूरोपियन कंपनियों पर निर्भर था मगर पिछले कुछ सालों में यहां की कई कंपनियां भी बड़े प्लांट बनाना जान गई हैं। इसके अलावा, परमाणु ऊर्जा इस्तेमाल करने के लिए चीन 23 मशीनों के सेट का निर्माण भी कर रहा है, जबकि दुनियाभर में ऐसे सिर्फ 57 सेट हैं। हालिया रिपोर्टो में कहा गया है कि भविष्य की मांग को देखते हुए चीन पहले से ही यूरेनियम की बड़ी मात्रा का भंडार जमा कर चुका है। वर्तमान में चीन करीब 750 टन यूरेनियम का प्रति वर्ष उत्पादन करता है। 2015 तक यूरेनियम की मांग-आपूर्ति का अंतर बढ़कर 10,000 टन तक होने की उम्मीद है जो 2030 तक करीब 30,000 टन तक पहुंच जाएगा। कैंब्रिज में मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में यूरेनियम उद्योग विशेषज्ञ और भौतिकविद् थॉमस नेफ के अनुसार, अपने नए रिएक्टरों की खातिर भंडार एकत्रित करने के लिए चीन अपनी यूरेनियम खरीद को दुगनी यानी करीब 5000 मीट्रिक टन तक कर सकता है। पिछले साल चाइना यूरेनियम डेवलपमेंट को. लि. ने ऑस्ट्रेलियन माइनर एनर्जी मेटल्स लि. में बहुलांश हिस्सेदारी खरीद ली थी। ऑस्ट्रेलियन कंपनी की काफी बड़ी मात्रा में यूरेनियम स्रोतों तक पहुंच है। 2010 में मांग में गिरावट आने के कारण यूरेनियम के दाम एक जगह बने रहे थे।

Thursday, January 6, 2011

भारत भी कोयले से बना सकेगा गैस!

नए साल में भारत कोयले से गैस बनाने की महत्वपूर्ण तकनीक हासिल कर सकता है। खासतौर पर जमीन के भीतर ही कोयले से गैस बनाने की एक खास तकनीक दक्षिण अफ्रीका से लेने की कोशिश में जल्दी सफलता मिलने के आसार हैं। कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल अगले हफ्ते दक्षिण अफ्रीका जाने वाले हैं और इस बारे में वहां समझौता होने के आसार हैं। जायसवाल की इस यात्रा का मकसद अफ्रीका में कुछ नए कोयला ब्लॉक खरीदने की संभावनाएं तलाशना भी है। जायसवाल ने दैनिक जागरण को बताया कि नए वर्ष में सरकार कोयला क्षेत्र में नई तकनीक लाने और विदेश में कोयला ब्लॉक खरीदने पर सबसे ज्यादा ध्यान देगी। अगले वर्ष अफ्रीका के कई देशों में कोयला ब्लॉकों की नीलामी होनी है। वहां चीन की कंपनियां पहले से ही काफी कोयला ब्लॉक हासिल कर चुकी हैं। भारत को अभी तक सिर्फ मोजाम्बिक में ही दो कोयला ब्लॉक खरीदने में सफलता मिली है। ऐसे में भारत सरकार हर तरह से कोशिश करेगी कि अफ्रीका के अन्य देशों में कोयला ब्लॉक हासिल किए जाएं। जायसवाल ने बताया कि देश में हाल ही में स्वच्छ कोयला तकनीक नीति लागू की गई है। इसके तहत हम दुनिया में कई देशों से कोयला से गैस बनाने की पर्यावरण अनुकूल तकनीक लेने की कोशिश कर रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका की कंपनियों के पास इस तरह की दो तकनीक हैं जिस पर हमारी नजर है। एक तकनीक से कोयले से सीधे उपयोग लायक गैस बनाई जा सकती है। अभी कोयले से गैस बनाने की तकनीकी में कई स्तर होते हैं। इस बारे में इस यात्रा के दौरान बातचीत शुरू होगी। दूसरी तकनीक कोयला भंडारों के भीतर ही कोयले से गैस बनाने से संबंधित है जिस पर पहले भी बात हो चुकी है। शायद इस बार दोनों देशों के बीच समझौता भी हो जाए। जायसवाल दक्षिण अफ्रीका के साथ ही मोजाम्बिक की यात्रा पर भी जाएंगे। इन दोनों देशों में भारत नए कोयला ब्लॉकों को हासिल करने के बारे में बातचीत करेगा। मालूम हो कि केंद्र सरकार ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारतीय कंपनियों को विदेश में बड़े पैमाने पर कोयला व पेट्रोलियम ब्लॉक खरीदने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। कोल इंडिया लिमिटेड इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भी नए कोयला ब्लॉक हासिल करने की कोशिश में हैं।

Saturday, January 1, 2011

इस साल बिजली क्षेत्र में खूब दौड़ा कर

 इस साल देश के बिजली क्षेत्र में जमकर करंट दौड़ा। कभी विनिवेश, कभी परमाणु ऊर्जा समझौतों और कभी क्षमता विस्तार की चर्चाओं से इस क्षेत्र ने खूब सुर्खियां बटोरीं। यह साल बिजली परियोजनाओं के आवंटन के लिए शुल्क आधारित बोली प्रक्रिया की ओर बढ़ने के लिए भी यादगार रहेगा। सरकार ने उम्मीद जताई कि यह नई पहल नौ फीसदी विकास दर हासिल करने और 12वीं योजना में कुल एक लाख मेगावाट की नई बिजली उत्पादन क्षमता स्थापित करने की दिशा में मददगार होगी। हालांकि 11वीं योजना के लिए सरकार ने बिजली उत्पादन लक्ष्य को 78,577 मेगावाट से घटाकर 62,374 मेगावाट कर दिया है। नवंबर तक देश में कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 1,67,317.3 मेगावाट तक पहुंच गई। बिजली कंपनियों में विनिवेश से भी इस साल यह क्षेत्र चर्चा में रहा। पावर ग्रिड कॉरपोरेशन और एनटीपीसी जैसी कंपनियों में विनिवेश से सरकार को करीब 20 हजार करोड़ रुपये मिले। एनटीपीसी के एफपीओ के जरिए 8,800 करोड़ रुपये जुटाए गए। इस विनिवेश के बाद कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी 89.5 फीसदी से घटकर 84.5 फीसदी रह गई। इसी तरह पावर ग्रिड कॉरपोरेशन के एफपीओ से 7,442 करोड़ रुपये और ग्रामीण विद्युतीकरण निगम के एफपीओ से 3,530 करोड़ रुपये जुटाए गए। अप्रैल में सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड के आइपीओ से 1,100 करोड़ रुपये जुटाए गए। इसके तहत केंद्र और हिमाचल प्रदेश सरकार की संयुक्त उद्यम कंपनी में सरकार ने अपनी दस फीसदी हिस्सेदारी बेची। अगले साल भी सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनियों में विनिवेश देखने को मिल सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली वित्त निगम (पीएफसी) चालू वित्त वर्ष के अंत तक एफपीओ लाने की कोशिश में है। निजी क्षेत्र की बिजली कंपनियां भी विस्तार के मूड में हैं। आने वाले साल में कई कंपनियों की आइपीओ लाने की योजना है। निजी क्षेत्र की जिंदल स्टील एंड पावर की अनुषंगी जिंदल पावर भी मार्च 2011 में अपना आइपीओ ला सकती है। इस साल परमाणु क्षेत्र में ऊर्जा प्रौद्योगिकी और ईधन के हस्तांरण के लिए फ्रांस के साथ महत्वपूर्ण समझौते हुए। इसका मकसद देश की तापीय और पनबिजली परियोजनाओं पर निर्भरता को घटाना और आने वाले वर्षो में कुल ऊर्जा उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी को बढ़ाना है। दिसंबर की शुरुआत में फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की यात्रा के दौरान भारत ने दो परमाणु रिएक्टरों के लिए 9.3 अरब डॉलर का समझौता किया। इसके तहत महाराष्ट्र के जैतापुर में प्रस्तावित परमाणु संयंत्र लगाने के लिए फ्रांस भारत को दो परमाणु रिएक्टर बेचेगा। फ्रांस की सरकारी कंपनी अरेवा इन रिएक्टरों की आपूर्ति करेगी। सरकार द्वारा पहचानी गई नई परियोजनाओं के संदर्भ में इस साल मौजूदा लागत प्लस शुल्क नीति के बजाए शुल्क आधारित बोली प्रक्रिया की नीति अपनाने का फैसला किया गया। यह नीति निजी क्षेत्र की छोटी कंपनियों के लिए फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि कम शुल्क ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सकता है। लागत प्लस प्रशुल्क में बिजली उत्पादकों से एकमुश्त शुल्क लिया जाता है। साथ ही वितरण कंपनियों द्वारा प्रति यूनिट शुल्क की वसूली की जाती है। 12वीं योजना के लक्ष्य को देखते हुए आने वाले वर्षो में बिजली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश और विस्तार गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं।